
बसोहली अपने नाम से भी प्राचीन है। इसके गढ़ के भीतर ढेरों गुप्त खजाने छिपे हैं— जिसमें इतिहास भी है और उससे उपजी समृद्ध संस्कृति भी। यहां की कला और संस्कृति ऐसे शांत वातावरण में समृद्ध होती आई है, जहां समय ठहर जाता है। चारो तरफ हरियाली से लदी पहाड़ी के बीच जो इतिहास छुपा है, उसकी अवतक ठीक से पड़ताल नहीं हुई है। कोई इस हरे-भरे आवरण के भीतर झाँक कर देखेगा, तो उसे बसोहली की भव्यता अपनी विशिष्ट चमक के साथ दिखाई देगी।
यहां की शानो-शौकत न तो जम्मू के शाही वंश की कृपा से रही है। न मुगलों या किसी अन्य राजवंशों की बदौलत। इसकी अपनी कहानी है, जिसमें एक किस्म का अनूठापन है। कठोर पहाड़ी चट्टानों के बीच कोमलता है, जिसका आकर्षण रावी नदी दोगुना कर देती है। यहां रंगों का गजब संयोग है। उत्सुकता पैदा करने वाली लोक-कथाएं हैं। उत्तेजित भाव को शांत करने वाली आध्यात्मिकता है। पीले रंग की प्रमुखता है, जो दूर से ही राहगीरों को आकर्षित कर लेता है। पीला रंग आशावादी, चंचल और खुशमिजाजी का प्रतीक है। वहीं इसे बुद्धिमता से भी जोड़कर देखा जाता है। बसोहली चित्रकारी यहां की उत्कृष्ट कृतियां हैं, जो दर्शकों पर जादू कर देती हैं। इनके गहरे रंग में स्थायी आकर्षण है, जो सदियों से यथावत बना हुआ है।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं की खोज करने और अपनी कला-संस्कृति पर गर्व करने का नारा दिया तो बसोहली का भी स्वयं जाग उठा। वैसे बसोहली का इतिहास एक राजधानी से गांव, फिर गांव से अर्ध-विकसित शहर बनने की दिलचस्प कहानी है। लेकिन, दिलचस्प बात यह है कि बसोहली आज भी अपनी प्राचीनता की निशानियों को समेटे हुए है। इसका आकर्षण पहाड़ों की बदलती रूपरेखा और हवा की उग्रता में निहित है। रावी नदी के किनारे कतारों में उगते पेड़ और रंजीत सागर बांध इस शहर की खूबसूरती को बढ़ा देते हैं। पहाड़ियों पर ढलते सूरज को शाम होते-होते पुरथू में झील पर अपनी छाया डालते हुए देखना किसी रहस्यमयी एहसास से कम नहीं है।
इनसब के बावजूद आश्चर्य की बात यह है कि जम्मू का यह क्षेत्र अवतक पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित नहीं हो पाया है। हालांकि, स्थानीय लोगों से रावी नदी पर जिस पुल का वादा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था, उसे मोदी सरकार ने 'अटल सेतु' का निर्माण कर पूरा कर दिया है। रावी नदी पर बने इस सुंदर पुल ने बसोहली तक की कठिन यात्रा आसान हो गई है। अब बसोहली को अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त करना है। जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने स्थानीय लोगों में यह ललक पैदा कर दी है। वर्ष 2023 में आयोजित 'बसोहली उत्सव' के उद्घाटन समारोह में माननीय उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा ने कहा था— "हमारे ऐतिहासिक गौरव के अनमोल हीरे और मोती यहां बिखरे हैं। इस स्थल का स्वर्णिम काल पुनः लौटे, इसके लिए हम सभी को जरूरी प्रयास करने होंगे। इच्छाशक्ति दिखानी होगी।"
समय की धारा ने भले ही बसोहली को हाशिये पर ठेल रखा है। लेकिन रावी का बहाव एक बार फिर गति पकड़ने वाला है, जिससे शहर को एक नया जीवन मिलेगा। छोटे-छोटे संयुक्त प्रयास संभावनाओं को पैदा करेंगे और किसी भी रुकावटों के कोहरे को चीर देंगे, जिससे बसोहली में रोशनी लौट आएगी। 'बसोहली उत्सव' उन्हीं छोटे प्रयासों का नाम है।
यूं तो 'बसोहली' भारत के इतिहास में एक छोटा सा राज्य रहा है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत में इसका कोई जोड़ नहीं रहा। भानुदत्त द्वारा रचित 'रसमंजरी' का चित्रण यहीं हुआ था। रावी नदी के दाहिने किनारे पर स्थित यह नगर कभी जम्मू के सात अजूबों में गिना जाता था। यहां खामोश खड़े किले अपनी प्राचीन गाथाओं को खंडरों में समेटे हुए हैं। यह किला कभी चित्र-चित्रों से सुसज्जित था, लेकिन आज वे चित्र नष्ट हो चुके हैं। अपने गौरवशाली इतिहास को मिटता देख स्थानीय लोगों में बेचैनी है। अब वे अपनी विरासत के अवशेष को बचाने में जुटे हैं।
लंबे इंतजार के बाद फिर से बसोहली चित्रकला को नया जीवन मिला है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया में इस चित्रकला की बारीकियां बता रहे हैं। यहां की 'विश्वस्थली' नामक संस्था बसोहली चित्रकला को नया आयाम देने के लिए लगातार काम कर रही है। बसोहली चित्रकला की जगह-जगह कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं।
यह स्मरण रहे कि बसोहली पेंटिंग सिर्फ चित्रकारी नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ी है। बसोहली के चित्र अपने युग के लोकाचार को दर्शाते हैं। इस असाधारण विरासत को संरक्षित करना हमारा धर्म है। बसोहली पश्मीना ऊन सहित अन्य रचनात्मक परंपराओं का भी केंद्र है, जो उत्पादन प्रक्रिया, तैयार उत्पादों पर नाजुक बुनाई और कढ़ाई के कारण अतुलनीय और अद्वितीय हैं।